तेल से जुड़े हितों के इर्दगिर्द टकराव के कई दौर देख चुके खाड़ी क्षेत्र को

उबलता भूमध्य सागर
तेल से जुड़े हितों के इर्दगिर्द टकराव के कई दौर देख चुके खाड़ी क्षेत्र को अमेरिका के तेल निर्यातक बन जाने के बाद उम्मीद की एक किरण नजर आई थी।

माना गया कि दुनिया की कूटनीतिक प्रौढ़ता से न सही, शेल ऑयल की मेहरबानी से ही यह इलाका चैन की सांस ले सकेगा। लेकिन व्यवहार में हुआ सिर्फ इतना कि टकराव के बहाने बदल गए। अभी तेल की जगह प्राकृतिक गैस तनाव का मुद्दा बनी हुई है, जिसे लेकर पूर्वी भूमध्य सागर में तुर्की और फ्रांस के जंगी जहाज आमने-सामने आ गए हैं। ये दोनों देश नाटो के सदस्य हैं, लेकिन स्थानीय समीकरणों की जटिलता में उलझकर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं।
तुर्की इस इलाके में ऑफ-शोर ड्रिलिंग को आगे बढ़ाने पर अड़ा है जबकि फ्रांस ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर तुर्की ने विवादित क्षेत्र में ऐसी कोई गतिविधि शुरू की तो वह मूक दर्शक नहीं बना रहेगा। विवाद की जड़ पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र में साढ़े तीन ट्रिलियन क्यूबिक मीटर (टीसीएम) गैस है, जिसमें 2.3 टीसीएम स्पष्ट रूप से इजिप्ट, इजरायल और साइप्रस के इकनॉमिक इंट्रेस्ट जोन में है।
आर्थिक संकट से जूझ रहे तुर्की को अपनी ताकत एक सदी पहले वाले स्तर तक लाने की संभावना इस गैस भंडार को हथिया लेने में ही नजर आ रही है। उसने लीबिया की सरकार से गैस बंटवारे का समझौता किया है और साइप्रस के तुर्क बहुल उत्तरी हिस्से पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए आगे बढऩे की रणनीति अपनाई है। मगर क्षेत्र के अन्य देश उसकी राह रोकने को तत्पर हैं।
ग्रीस, साइप्रस और इजरायल ने जनवरी में समुद्र के अंदर 1900 किलोमीटर की गैस पाइपलाइन बनाने का समझौता किया और इटली, जॉर्डन तथा फिलस्तीन के साथ मिलकर एक ब्लॉक भी बना लिया। फ्रांस ने इस ब्लॉक की सदस्यता के लिए आवेदन कर रखा है। इन सबका साझा मकसद तुर्की को यहां की गैस से दूर रखना है। समुद्री मामलों के अंतरराष्ट्रीय कानूनों को लेकर भी दोनों धड़ों की अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं।
ग्रीस की दलील है कि हर छोटे-बड़े देश का अपनी समुद्री सीमा और आर्थिक क्षेत्र में अपना ड्रिलिंग राइट है, जबकि तुर्की का कहना है कि पूर्वी भूमध्य सागर के गैस वाले इलाके उसके कॉन्टिनेंटल शेल्फ में आते हैं, वहां किसी अन्य देश का कोई अधिकार नहीं है। तुर्की और चीन दुनिया के उन 15 देशों में हैं जो समुद्री कानूनों के यूएन कन्वेंशन को स्वीकार नहीं करते। अब से तीन-चार दशक पहले तक समुद्र से जुड़े आर्थिक हित सिर्फ मछलियां पकडऩे और जहाजों की आवाजाही तक सीमित माने जाते थे। लेकिन अभी यह तेल-गैस और खनिजों के स्रोत के रूप में सबका ध्यान खींच रहा है। ऐसे में भूमध्य सागर हो या साउथ चाइना सी, हर जगह स्थितियां विस्फोटक हो रही हैं। अच्छा होगा कि समुद्री हितों को लेकर समय से कुछ सर्वमान्य सूत्र खोज लिए जाएं, वरना कोई छोटी सी चिनगारी भी इनमें से किसी भी टकराव को बहुत बड़ा रूप दे देगी।

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