महोबा बारहवीं शताव्दी के चन्देल साम्राज्य के गौरवशाली अतीत व समृतियों को संजोये उत्तर भारत का सबसे प्राचीन 837 वर्ष पुराना ऐतिहासिक कजली मेला उस्ताद चाचा ताला सैय्यद वीर आल्हा ऊदल के शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक के साथ साथ सांप्रदायिक सौहार्द का जीता जागता उदाहरण है ।

नगर पालिका परिषद एवं संरक्षण व विकास समिति महोबा द्वारा आयोजित बुंदेल खण्ड की आन बान शान से जुड़ा कजली मेला सन 1181 में दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान और महोबा नरेश चन्देल शासक परमाल के बीच हुये ऐतिहासिक युद्ध की याद दिलाता है। युद्ध के दौरान चन्देल शासक परमाल ने कीरत सागर के तट पर पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर जीत दर्ज की थी। जीत की ख़ुशी में शुरू हुआ कजली मेला सैकड़ों साल बाद भी परंपरागत तरीके से मनाया जाता है। इस मेले में लाखों की भीड़ जुटती है लोग चाचा ताला सैय्यद आल्हा ऊदल और उनके पराक्रमी साथियों के बलिदान व शौर्य को श्रद्धा व सम्मान के साथ नमन करने आते हैं ।
बाइट- पुष्पेंद्र चंदेल (सांसद महोबा -हमीरपुर)
V/O 2 – सन 1181 में श्रावण पूर्णिमा के दिन चन्देल शासक परमाल की रानी मल्हना व राजकुमारी चन्द्रावल अपनी सखियों के साथ कीरत सागर सरोवर पर भुजरियां विसर्जन करने जा रहीं थी तभी दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडाराय ने राजकुमारी चन्द्रावल को अपहरण कर महोबा पर चारों ओर से भीषण आक्रमण कर दिया । महोबा के सूरबीर उस्ताद चाचा ताला सैय्यद व आल्हा ऊदल के नेतृत्व में चन्देली सेना ने कीरत सागर तट पर पृथ्वीराज चौहान की सेना को मुंह तोड़ जबाब देते हुये भीषण युद्ध किया। इस युद्ध में पृथ्वीराज का पुत्र सूरज सिंह मारा गया व सेनापति चामुंडाराय बुरी तरह घायल हुआ नतीजन पृथ्वीराज की सेना बुरी तरह पराजित हुयी । 24 घण्टे चले युद्ध में चन्देली सेना के दो सूरबीर अभयी और रंजीत भी शहीद हुये दिल्ली फौज को खदेड़कर चन्देली सेना के जांबाज फौज राजकुमारी चन्द्रावल को शकुशल वापस महल ले आयी थी। उस्ताद ताला सैय्यद वीर आल्हा – ऊदल व चन्देली सेना के वीरों की वीरता से प्रसन्न होकर रानी मल्हना ने अगले दिन गोखागिरि पर्वत में एक शिलाखंड पर उत्कीर्ण विशाल शिव प्रतिमा के समक्ष प्रजा के साथ आराधना कर विजय उत्सव मनाया था । 837 वर्षों से लगातार महोबा वासी इस परम्परा का निर्वाहन करते हुये इसे परम्परागत तरीके से मनाते आ रहे हैं ।

चन्देल शासक परमाल और पृथ्वीराज चौहान के बीच 24 घण्टे चले युद्ध के कारण महोबा राज्य में रक्षा बंधन का त्यौहार नहीं मनाया जा सका था । युद्ध समाप्त हो जाने के दूसरे दिन रानी मल्हना व राजकुमारी चन्द्रावल ने अपनी सखियों से साथ कीरत सागर सरोवर पर भुजरियां विसर्जन की थीं , इसके बाद पूरे राज्य में रक्षा बंधन का का पर्व मनाया गया था , तभी से परम्परागत क्षेत्र के लोग रक्षा बंधन के एक दिन बाद अपनी बहनों से राखी बंधवाते हैं ।

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