वाराणसी – काशी में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार को लेकर कई प्रकार की कहावतें हैं जिसको लेकर काशी के घाट बहुत प्रसिद्ध हैं। लोग दूर-दूर से काशी सिर्फ इसलिए आते हैं जिससे उन्हें मोक्ष प्राप्त हो सके। इन सब के बीच रविवार को काशी नगरी में एक और अनूठा मामला देखने को मिला जिसमें 95 साल की एक वृद्ध महिला को उसकी बेटियों और बहुओं के साथ-साथ गांव की महिलाओं ने अर्थी को न सिर्फ कंधा दिया बल्कि उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुईं।

बात दें कि बरियासनपुर गांव की 95 वर्षीया संतोरा देवी का रविवार को निधन हो गया। इसके बाद उनकी इकलौती बेटी पुष्पावती पटेल ने मां की अर्थी को न सिर्फ कंधा देने का निर्णय लिया बल्कि भाभी प्रभावती, अमरावती, और कलावती समेत पड़ोस की महिलाओं के सहयोग से दादी की शवयात्रा भी निकाली।

महिलाओं का यह निर्णय लोगों को चौंकाने वाला था क्योंकि संतोरा के दो पुत्र मौके पर मौजूद थे। लोगों ने सामाजिक मर्यादाओं, परम्पराओं और मान्यताओं की दुहाई दी लेकिन बेटी और बहुओं के आगे किसी की भी न चली। अन्ततः संतोरा की बेटी ने अपनी तीनों भाभी और पड़ोस की महिलाओं के सहयोग से मां की अर्थी को कंधा दिया। शवयात्रा करीब एक किलोमीटर चिरईगांव ब्लाक मुख्यालय तक गई। इसके बाद गांव की महिलाएं तो लौट आईं लेकिन बेटी और तीन बहुएं सराय मोहना घाट स्थित शमशान तक गईं और अंतिम संस्कार में शामिल भी हुईं।

बहू-बेटियों ने पूरी की दादी की अंतिम इच्छा

संतोरा देवी के पति की मौत करीब 20 वर्ष पहले ही हो चुकी थी। इसके बाद संतोरा ने नेत्रदान का संकल्प लिया। उसी समय उन्होंने यह भी संकल्प लिया था कि मेरी अर्थी को कंधा मेरी इकलौती बेटी देगी। जिससे समाज का यह मिथक टूट सके कि बेटा ही अर्थी को कंधा दे सकता है। रविवार को उनकी मृत्यु के बाद संतोरा देवी की बहू और बेटियों ने उनके संकल्प को पूरा किया।

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