101 महिलाओं द्वारा तर्पण क़र मनाई गई पितृपक्ष मातृ नवमी: मनकामेश्वर मठ-मंदिर

 

 

 

लखनऊ।पूजनीय ब्रह्मलीन ‘एवं पितृगणों के सम्मान, पूजन एवं स्मरण पवित्र पखवाड़ा श्राद्ध समस्त विश्व मे सनातन एवं वैदिक परम्पराओं के साथ आज अपनी नवमी की ओर चला, इस दिन को समस्त सनातन धर्मियों ने मातृ नवमी रूप में मना रहे हैं । इस नवमी तिथि का श्राद्ध पक्ष में बहुत ही महत्त्व है। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार श्राद्ध करने के लिए एक पूरा पखवाड़ा ही निश्चित कर दिया गया है। सभी तिथियाँ इन सोलह दिनों में आ जाती हैं। कोई भी पूर्वज जिस तिथि को इस लोक को त्यागकर परलोक गया हो, उसी तिथि को इस पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है, लेकिन स्त्रियों के लिए नवमी तिथि विशेष मानी गई है, जिसे ‘मातृ नवमी’ भी कहते हैं कही कही इस दिवस को *’डोकरा नवमी’, ‘सौभाग्यवती श्राद्ध।* मातृ नवमी के दिन पुत्रवधूएँ अपनी स्वर्गवासी सास व माता के सम्मान एवं मर्यादा हेतु श्रद्धाजंलि देती हैं और धार्मिक कृत्य करती हैं।इस पर्व का सबसे अद्भुत नज़र नागर के सबसे प्राचीन मंदिर मनकामेश्वर मठ-मंदिर के गोमती तट स्थित मनकामेश्वर उपवन घाट पर देखने को मिला। बुधवार को प्रातः 6 बजे से ही मनकामेश्वर उपवान घाट पर हर आयु वर्ग की महिलाएं एकत्रित होने लगी,  प्रथम तर्पण में 101 महिलाओं द्वारा 5 आचार्यों की उपस्तिथि में मातृ नवमी श्राद्ध पूजन कर अपने पितरों को दिव्यता अर्पित की। आचार्यो न नेतृत्व पंडित शिव राम अवस्थी की दक्षता मे हुआ। इस सम्पूर्ण कार्यक्रम के बारे मे हमारे विशेष संवाददाता से बात करते हुए मंदिर प्रसाशन ने कहा की “जैसे की आप सब जानते हैं हमारे सनातन धर्म में पितृपक्ष पखवाड़े का विशेष धार्मिक महत्व है  इस अवधि में हमारे पूर्वज मोक्ष प्राप्ति की कामना लिए अपने परिजनों के निकट अनेक रूपों में आते हैं। इस पर्व में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व उनकी आत्मा की शांति देने के लिए श्राद्ध किया जाता है और उनसे जीवन में खुशहाली के लिए आशीर्वाद की कामना की जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार जिस तिथि में माता-पिता, दादा-दादी आदि परिजनों का निधन होता है। इन 16 दिनों में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना उत्तम रहता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उसी तिथि में जब उनके पुत्र या पौत्र द्वारा श्राद्ध किया जाता है तो पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्ति मिलकर पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। हमारे पितरों की आत्मा की शांति के लिए ‘श्रीमद भागवत् गीता’ या ‘भागवत पुराण’ का पाठ अति उत्तम माना जाता है”.