विज्ञान सबके लिए, विज्ञान-प्रौद्योगिकी मंत्रालय की पहल


नए साल की शुरुआत में ही केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने खुली विज्ञान नीति के तहत वैज्ञानिक शोधों से जुड़ी तमाम जानकारियां और आंकड़े सबको सुलभ कराने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है।

इसका मकसद यह सुनिश्चित करना बताया जा रहा है कि देश-विदेश में विज्ञान और तकनीक को लेकर जो भी गतिविधियां चल रही हैं

और उनसे जो निष्कर्ष निकल कर सामने आ रहे हैं वे कुछ लोगों तक सीमित न रह जाएं,

अपनी इच्छा और पसंद के आधार पर हर कोई उन तक पहुंच बना सके। अभी दिक्कत यह है कि दुनिया की सबसे अच्छी और प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिकाएं काफी महंगी हैं।

सामान्य व्यक्तियों की बात तो दूर रही, बड़े संस्थानों को भी अक्सर इन पत्रिकाओं का सब्सक्रिप्शन लेने से पहले सोचना पड़ता है।

नई विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति के प्रारूप के मुताबिक सरकार का इरादा यह है कि दुनिया की बेहतरीन मानी जाने वाली तीन-चार हजार विज्ञान पत्रिकाओं का एकमुश्त सब्सक्रिप्शन ले ले और देशवासियों को उन्हें मुफ्त उपलब्ध कराए।

इसके लिए सालाना दो-तीन हजार करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे, लेकिन इसके फायदों को देखा जाए तो यह रकम कुछ भी नहीं है।

यह खुली विज्ञान नीति देश के अंदर होने वाली रिसर्चों पर भी लागू होगी। प्रस्थापना यह है कि सरकारी फंडिंग से होने वाली तमाम रिसर्चों का भार वास्तव में देश के टैक्सपेयर्स ही उठाते हैं।

इसलिए इनसे निकलने वाले नतीजों की जानकारी पाने के लिए उन्हें फिर से पैसा भरने के लिए कहना उचित नहीं।

लिहाजा सरकारी सहायता से होने वाले सभी शोधों से जुड़ी रिपोर्टें लोगों को मुफ्त मुहैया कराई जाएंगी।
इस नई नीति का प्रारूप एक जनवरी को सार्वजनिक करके इस पर लोगों से सुझाव मांगे गए हैं। उम्मीद की जा रही है कि साल के मध्य तक जरूरी संशोधनों के साथ इस नीति को मंजूरी मिल जाएगी। ध्यान देने की बात है

कि अब तक किसी भी देश ने इस तरह की कोई पहल नहीं की है। भारतीय समाज इस दिशा में पहले कदम बढ़ाकर अन्य विकासशील समाजों को भी इसके लिए प्रेरित कर सकता है।

इस कदम से न केवल समाज के लोकतांत्रिक मिजाज को मजबूती मिलेगी बल्कि वैज्ञानिक सोच को लोगों के बीच प्रतिष्ठित करने का काम भी होगा।

इससे यह समझ बनाने में मदद मिलेगी कि वैज्ञानिक दृष्टि सिर्फ लैब में बैठकर रिसर्च करने के लिए नहीं होती।


हर पल, हर चीज को जिज्ञासा और तर्क से जोड़कर देखना ही वैज्ञानिक विचार पद्धति को अपनाना है।

आज के दौर में जब कई पीछे छूट चुकी बहसें नए सिरे से जिंदा हो रही हैं और दफन किए जा चुके अंधविश्वासों के भूत अलग-अलग तबकों में सिर उठाते दिख रहे हैं,

तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की इस पहल की अहमियत और बढ़ जाती है।

सरकार इस प्रारूप को जितनी जल्दी अपनी नीति का हिस्सा बना सके, उतना ही बेहतर रहेगा।

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