आरसीईपी सबसे बड़ा समझौतादस आसियान देशों का….


दस आसियान देशों का चीन, जापान, साउथ कोरिया, न्यू जीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर किया गया

आरसीईपी (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप) समझौता दीर्घकालिक स्तर पर वैश्विक व्यापार के स्वरूप को प्रभावित करने वाली बेहद महत्वपूर्ण घटना है।

इसकी अहमियत का अंदाजा इस बात से होता है कि समझौते में शामिल पंद्रहों देश मिलकर ग्लोबल जीडीपी के करीब 30 फीसदी हिस्से को कवर कर लेते हैं।

समझौते को लेकर बातचीत हालांकि 2012 से ही चल रही थी और शुरुआती सालों में इसमें भारत भी शामिल था

, लेकिन सात साल विभिन्न दौर की बातचीत चलने के बाद जब चीजें निर्णायक चरण में पहुंच

कर ठोस शक्ल लेने लगीं तो भारत को अहसास हुआ कि लाख कोशिशों के बावजूद प्रस्तावित समझौते को एक हद से ज्यादा बदला नहीं जा सकता

और अपने अंतिम रूप में यह भारतीय खेती तथा कृषि आधारित उद्योगों को बुरी तरह प्रभावित करेगा। लिहाजा पिछले साल इस समझौते से उसने खुद को बाहर कर लिया।


बावजूद इसके, दुनिया के इस सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते के प्रभावों से खुद को अछूता रखना भारत के लिए संभव नहीं होगा।

पूर्वी देशों के बाजार में संभावनाएं तलाशने का काम भारत अभी ठोस ढंग से शुरू भी नहीं कर पाया है, जो इस समझौते के लागू हो जाने के बाद और मुश्किल हो जाएगा।

दूसरी और इससे भी बड़ी चुनौती इन देशों के सस्ते माल से विश्व बाजार में अपनी जगह सुरक्षित रखने की होगी।

भारत भले ही आरसीईपी समझौते का हिस्सा न हो, पर इन सभी देशों से उसके अच्छे व्यापारिक रिश्ते हैं।

चूंकि यह समझौता विभिन्न देशों के लिए एक-दूसरे से कच्चा और अर्धनिर्मित माल खरीदना पहले से कहीं ज्यादा आसान बना देगा, लिहाजा इसका सीधा परिणाम यह होगा

कि भारत अपनी तरफ से टैक्स में अतिरिक्त छूट न दे तो भी इनका माल भारत के बाजार में पहले से कम कीमत पर आने लगेगा। स्वाभाविक रूप में इससे भारतीय कंपनियों की चुनौतियां बढ़ जाएंगी।

यह स्थिति दुनिया के अन्य बाजारों में भी भारतीय कंपनियों के उत्पाद के लिए कॉम्पिटिशन में टिके रहना मुश्किल बना सकती है।


अच्छी बात यह है कि यह समझौता तत्काल लागू नहीं होने जा रहा। सभी संबंधित देशों को अपनी-अपनी संसदों से इसकी पुष्टि करानी होगी,

जिसके लिए 2024 तक की समय सीमा रखी गई है।

इस बीच आरसीईपी में भारत की वापसी के लिए भी दरवाजा खुला है। यानी भारत चाहे तो कुछ समय बाद भी समझौते का हिस्सा बन सकता है।

इसका मतलब यह है कि भारत के पास आरसीईपी समझौते के संभावित प्रभावों पर बारीकी से विचार करते हुए

इसके दुष्प्रभावों से बचने के उपाय तलाशने और जरूरी लगे तो आवश्यक सावधानियां बरतते हुए समझौते में शामिल होने का भी मौका बचा हुआ है।

उम्मीद करें कि भारत इस मौके का सही उपयोग करते हुए वक्त रहते उपयुक्त कदम उठा लेगा।

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