ईपीएफ पर नेगेटिव रिटर्न से उठे सवाल


एम्प्लॉयीज प्रॉविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (ईपीएफओ) के निवेश संबंधी फैसले इधर कर्मचारियों की चिंता बढ़ाने लगे हैं। खबर है कि ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड) के जरिए पिछले पांच साल से किए जा रहे निवेश का रिटर्न ईपीएफओ के लिए नेगेटिव में आया है। इस साल 31 मार्च की स्थिति के मुताबिक 1.03 लाख करोड़ रुपये के इक्विटी निवेश पर कुल मिला कर माइनस 8.3 फीसदी रिटर्न है जबकि सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज के ईटीएफ पर माइनस 24.36 फीसदी। ईटीएफ किसी म्युचुअल फंड जैसा ही एक इन्वेस्टमेंट फंड होता है, जिसकी खासियत यह है कि उसे कभी भी बेचा-खरीदा जा सकता है।


ईपीएफओ अपनी सालाना जमा रकम का 85 फीसदी डेट इंस्ट्रूमेंट्स (बॉन्ड्स, डिबेंचर, प्रॉमिसरी नोट आदि) में निवेश करता है जबकि 15 फीसदी ईटीएफ के जरिए इक्विटी निवेश यानी शेयर खरीदने में लगाता है। इक्विटी निवेश आम तौर पर ज्यादा जोखिम वाला होता है लेकिन जोखिम ज्यादा होने के कारण उसमें रिटर्न भी ज्यादा होने की उम्मीद की जाती है। इस बार महामारी के चलते डेट इंस्ट्रूमेंट्स का प्रदर्शन खराब रहने का अंदेशा था तो ईटीएफ से बेहतर रिटर्न स्थिति को संभाल सकता था। मगर उसका हाल तो और भी बुरा निकला। यहां मामला ईटीएफ के चयन का भी है।
सवाल उठ रहा है कि जिन ईटीएफ को चुना गया वे सही थे या नहीं, लेकिन बड़ी बहस इस बात को लेकर चली आ रही है कि आखिर लाखों कर्मचारियों की जीवन पर्यंत बचत को बाजार के जोखिम के अधीन कर देना कितना जायज है। पांच साल पहले जब यह फैसला किया गया था तब भी कर्मचारी संगठनों ने इसका विरोध किया था। तब यह दलील दी गई थी कि आज के जमाने में कोई भी निवेश बाजार के रिस्क से बाहर नहीं है। खुद कर्मचारी भी अपनी बचत प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बाजार में ही लगाते हैं। मगर कोई व्यक्ति सारी सूचनाएं जुटाकर उस आधार पर सोचे-समझे ढंग से अपने पैसे का निवेश करे, इसमें और लाखों कर्मचारियों की मेहनत की कमाई उनसे राय-मशविरा किए बगैर बाजार में झोंक देने में बुनियादी अंदर होता है।
बहरहाल, नेगेटिव रिटर्न की यह खबर न केवल निकट भविष्य में रिटायर होने वाले बल्कि तमाम कर्मचारियों को बेचैन कर सकती है। भारत की निरंतर बढ़ती अर्थव्यवस्था में नेगेटिव ग्रोथ एक बिल्कुल नई चीज है। इसी तरह नेगेटिव रिटर्न भी कोई ऐसा कॉन्सेप्ट नहीं है जिससे लोग परिचित हों और उसे सहजता से स्वीकार कर लें। हां, बैंकों के डूबने की खबरों से वे परिचित हैं और मेहनत की कमाई एक झटके में गायब हो जाने की मर्मांतक पीड़ा को समझ सकते हैं। पीएफ तो ऐसी निधि है जिस पर बुढ़ापे की पूरी आस टिकी रहती है। स्वाभाविक है कि ईपीएफओ सेंट्रल बोर्ड की अगले हफ्ते होने वाली बैठक पर सबकी निगाहें लगी होंगी। अच्छा होगा कि सरकार अपनी तरफ से पहल करके कर्मचारियों को यह विश्वास दिलाए कि ईपीएफ में आया पैसा पूरी तरह सुरक्षित है और निवेश संबंधी फैसलों की आंच आम कर्मचा

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