पल्ला न झाड़े सरकार लॉकडाउन के दौरान अमानवीय परिस्थितियों

पल्ला न झाड़े सरकार
लॉकडाउन के दौरान अमानवीय परिस्थितियों में भीषण तकलीफें झेलते हुए अपने-अपने गांवों की ओर सफर करने के क्रम में जान गंवाने वाले प्रवासी मजदूरों के प्रति केंद्र सरकार का जो रुख सामने आया है वह न केवल गैरजिम्मेदार और संवेदनहीन है

पल्ला न झाड़े सरकार लॉकडाउन के दौरान अमानवीय परिस्थितियों
पल्ला न झाड़े सरकारलॉकडाउन के दौरान अमानवीय

बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के लिए शर्मनाक भी है। लॉकडाउन के बहुचर्चित फैसले के बाद आयोजित संसद के इस पहले सत्र में प्रवासी मजदूरों का यह मसला स्वाभाविक रूप से उठा।

लॉकडाउन के बहुचर्चित फैसले के बाद आयोजित संसद

एक सांसद के सवाल के लिखित जवाब में सरकार ने माना कि उस दौरान एक करोड़ से ज्यादा मजदूर देश के अलग-अलग हिस्सों से बदहवासी के आलम में अपने अपने गांवों की ओर चल पड़े थे।

जान गंवाने वाले मजदूरों का कोई आंकड़ा उसके पास नहीं है

मगर इसके साथ ही उसका कहना है कि इस यात्रा में जान गंवाने वाले मजदूरों का कोई आंकड़ा उसके पास नहीं है, इसलिए उन मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने का सवाल ही नहीं उठता। यह भी गौर करने की बात है कि सरकार ने अचानक शुरू हुए उस पलायन के लिए फेक न्यूज को जिम्मेदार ठहराया है।


सरकार को यह स्वीकार करना चाहिए कि देश में उत्पन्न हुई उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के लिए बिना किसी तैयारी और पूर्वसूचना के अचानक देश भर में पूर्ण लॉकडाउन लागू करने का उसका फैसला जिम्मेदार था। लॉकडाउन से सारे काम धंधे बंद हो गए।

पूर्ण लॉकडाउन लागू करने का उसका फैसला जिम्मेदार था।

बड़े शहरों में रोज मेहनत करके परिवार पाल रहे लोगों की आमदनी का जरिया समाप्त हो गया। कई मकान मालिकों ने किराया न मिलने की आशंका में उन्हें बाहर निकालकर कमरे पर ताला मार दिया। परिवार सहित बेघर रहने और भूखों मरने की स्थिति से बचने का मजदूरों को एक ही उपाय नजर आया

बेघर रहने और भूखों मरने की स्थिति से बचने का मजदूरों को एक ही उपाय नजर आया

कि किसी तरह अपने गांव पहुंच जाएं। लॉकडाउन के चलते बस-ट्रेन सब बंद थीं। मजबूरन सैकड़ों मील लंबी दूरियां उन लोगों ने पैदल ही नापने का फैसला किया।

बाद में नैतिक दबाव की स्थिति में जो श्रमिक स्पेशल ट्रेनें सरकार ने चलवाईं वे भी तमाम अव्यवस्थाओं की शिकार रहीं।

बहुत सी मौतें ट्रेन में भूख-प्यास और असह्य गर्मी के चलते हुईं जबकि कई मौतें सड़क और ट्रेन दुर्घटनाओं में हुईं।

जबकि कई मौतें सड़क और ट्रेन दुर्घटनाओं में हुईं।


यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने इन मौतों से जुड़ी सूचनाएं जुटाने की जहमत नहीं उठाई। फिर भी इसे बहाना बनाकर मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने की अपनी जिम्मेदारी से सरकार पल्ला नहीं झाड़ सकती। सूचनाएं अब भी जुटाई जा सकती हैं।

अपनी जिम्मेदारी से सरकार पल्ला नहीं झाड़ सकती।

अखबारों में ब्यौरेवार खबरें मौजूद हैं। रेलवे के पास उसके रेकॉर्ड होंगे। अस्पताल, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के पास जानकारी होगी। कुछ मौतें ऐसी हो सकती हैं जिनकी रिपोर्ट न आ पाई हो।

कुछ मौतें ऐसी हो सकती हैं जिनकी रिपोर्ट न आ पाई हो।

उनके बारे में सूचनाएं अखबारों में नोटिस देकर मंगवाई जा सकती हैं और मुआवजे के दावों की सचाई कई तरीकों से जांची जा सकती है। लेकिन जिन गरीब परिवारों के कमाने वाले सदस्य मारे गए हैं

लेकिन जिन गरीब परिवारों के कमाने वाले सदस्य मारे गए हैं

वे आज भी बहुत बुरी दशा में हैं। इस राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आपदा के समय अपने देश की सरकार से सहानुभूति और सहायता प्राप्त करना उनका अधिकार है।

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