साख का सवाल देश में कोरोना से बचाने वाले टीकों- कोविशील्ड….

साख का सवालदेश में कोरोना से बचाने वाले टीकों- कोविशील्ड और कोवैक्सीन के इमर्जेंसी इस्तेमाल की इजाजत देशवासियों के लिए जितनी बड़ी राहत की खबर बन सकती थी,

उतनी नहीं बन पाई। वजह यह रही कि खबर आने के ठीक बाद विपक्ष के कई नेताओं ने इस मंजूरी पर सवाल खड़े कर दिए। उनका कहना था कि मंजूरी देने में जो हड़बड़ी दिखाई गई है,

वह बेहद खतरनाक है। सरकार और सत्तारूढ़ दल की तरफ से इन आरोपों का जवाब चिर-परिचित अंदाज में विपक्षी नेताओं पर हमले की शक्ल में दिया गया।

निश्चित रूप से विपक्ष के कुछ नेता अवसर की अपेक्षा के अनुरूप गंभीरता नहीं दिखा सके।
इन वैक्सीनों को बीजेपी का टीका करार देना और इन्हें नपुंसकता से जोडऩा न केवल गलत है

बल्कि कठिन चुनौती के इस दौर में देशवासियों के बीच अविश्वास और संदेह का माहौल पैदा करता है।

बावजूद इसके, विपक्षी नेताओं के उठाए सवालों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। यह सच है कि किसी लोकतांत्रिक देश में राजनेताओं के बयानों की पहुंच ज्यादा होती है और इस वजह से इन बयानों की गूंज ज्यादा बड़ी हो गई है

लेकिन सवाल सिर्फ राजनीतिक हलकों में नहीं, विशेषज्ञों और जानकारों की ओर से भी उठाए जा रहे हैं। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत बायोटेक द्वारा बनाए गए टीके कोवैक्सीन का फेज-3 ट्रायल अभी पूरा नहीं हुआ है।


ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि डीसीजीआई (ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया) ने आखिर किस आधार पर इस वैक्सीन को सुरक्षित मान लिया।

मंजूरी की घोषणा के बाद स्वाभाविक ही अपेक्षा की जा रही थी कि इससे जुड़े सभी सवालों के जवाब दिए जाएंगे, लेकिन लिखित वक्तव्य पढऩे के बाद बिना कोई सवाल लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म कर दी गई।

ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क ने ठीक ही नियामक से अनुरोध किया है कि जिन आंकड़ों के आधार पर मंजूरी देने का फैसला लिया गया है, उन्हें सार्वजनिक किया जाए ताकि उनका स्वतंत्र परीक्षण किया जा सके।

देश में टीकों को लेकर हिचक पैदा करने वाली कई घटनाएं हो चुकी हैं जिन पर कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण अबतक नहीं आया है।


एक बहुचर्चित मामले में हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री टीका लेने के बाद कोरोना संक्रमित हो गए। यह कहना काफी नहीं कि उन्होंने एक ही डोज लिया था

, इसलिए संक्रमित हो गए। इसका जांच आधारित स्पष्ट जवाब मिलना चाहिए कि वह संक्रमण किसी रूप में टीके का ही दुष्परिणाम तो नहीं था।

अमेरिका और ब्रिटेन में टीके के नतीजों को लेकर सवाल उठे तो ठहरकर उनके संतोषजनक जवाब दिए गए। कोई कारण नहीं

कि भारतीय नियामक संस्थाएं लोगों को आश्वस्त करने की अपनी जवाबदेही से बचने का प्रयास करें। सवाल सिर्फ इस टीके का नहीं, देश के पूरे फार्मास्यूटिकल सेक्टर की साख का है।

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