नए ढब में बिहार चुनाव


बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखें भले न घोषित हुई हों पर चुनावी तैयारी से जुड़ी हलचलें चरम पर हैं। लड़ाई में कौन किस तरफ और किस कीमत पर रहेगा, इसे लेकर भी गतिविधियां तेज हो रही हैं।

खास बात यह कि इस बार दोनों ही चुनावी खेमों में छोटे दलों को तवज्जो न देने का रुझान दिखाई दे रहा है। विपक्षी गठबंधन की बात करें तो इसमें शामिल आरएलएसपी जैसे दल मुख्यमंत्री प्रत्याशी का सवाल उठाते हुए काफी पहले से यह कहने लगे थे कि नीतीश कुमार के सामने आरजेडी के युवा नेता तेजस्वी यादव फिट नहीं बैठते। मगर आरजेडी ने इस सवाल पर ध्यान देना तो दूर, गठबंधन सहयोगियों के साथ बैठना भी जरूरी नहीं समझा। सिर्फ अपनी तरफ से यह स्पष्ट कर दिया कि मुख्यमंत्री का चेहरा गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी तय करेगी।
इसी तरह सत्तारूढ़ एनडीए में एलजेपी नेता चिराग पासवान लगातार बिहार सरकार और नीतीश कुमार पर हमले कर रहे हैं, लेकिन एनडीए नेतृत्व उनके बयानों का नोटिस ही नहीं ले रहा। माना जा रहा है कि उनकी कोशिश तालमेल में ज्यादा सीटें पाने की है, लेकिन जेडीयू और बीजेपी का तर्क है कि ज्यादा सीटों पर लडऩे से ज्यादा सीटें नहीं आ जातीं। पिछले विधानसभा चुनाव में 42 सीटों पर लड़कर एलजेपी महज दो सीटें जीत पाई थी। कुल मिलाकर इस बार मुकाबला दो दल (जेडीयू-बीजेपी) बनाम दो दल (आरजेडी-कांग्रेस) का बनता दिख रहा है। दूसरी खास बात यह कि विपक्ष तो हमेशा की तरह सरकार की गड़बडिय़ों और नाकामियों को मुद्दा बना रहा है, पर सत्तापक्ष नई पिच की तलाश में है। नीतीश कुमार आम तौर पर अपनी सरकार के कामकाज को ही मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ते रहे हैं, पर इस बार उन्होंने 15 साल पहले के लालू शासन को यानी बिहार के कथित जंगल राज को मुद्दा बनाने की कोशिश की। यह और बात है कि पिछले चुनाव में ही आरजेडी के साथ उनका सफल महागठबंधन प्रयोग उनके आड़े आ गया। स्वाभाविक रूप से एनडीए को बिहार में किसी तगड़े भावनात्मक मुद्दे की जरूरत थी।
बीजेपी के पास हिंदुत्व के रूप में ऐसा एक रेडीमेड मुद्दा हमेशा उपलब्ध रहता है लेकिन बिहार में उसका हिंदुत्व कार्ड अबतक एक बार भी बाकी राज्यों जितना नहीं चल पाया है। राष्ट्रवाद जरूर चलता है, जैसा पिछले आम चुनाव के दौरान बिहार के वोटरों पर पुलवामा कांड के असर से जगजाहिर है, पर हिंदुत्व नहीं चलता। यही वजह है कि यहां बीजेपी को जेडीयू का छोटा भाई बनकर ही रहना पड़ता है। बहरहाल, इन सबका मिला-जुला परिणाम यह हुआ कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को सत्ता पक्ष की ओर से जबर्दस्त भावनात्मक रंग दिया जा रहा है और विपक्ष इसे मौन समर्थन देने के सिवा कुछ कर नहीं पा रहा। इस क्रम में पहली बार एक हिंदीभाषी राज्य में क्षेत्रीय अस्मिता बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभरी है, हालांकि यह किस हद तक वोटों में बदलती है, इसका पता चुनाव नतीजे आने के बाद ही चलेगा।

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