मानव मूल्यों को समृद्ध करते हैं खेल

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पिछले दिनों क्रिकेट विश्व कप में भारत द्वारा पाकिस्तान को हराये जाने पर देश के गृहमंत्री द्वारा की गई टिप्पणी ‘अनदर स्ट्राइक ऑन पाकिस्तानÓ बहुत ही अनुचित है। इसके साथ यह टिप्पणी उनके पद की गरिमा के विपरीत एवं अशोभनीय भी है। ऊंचे पदों पर बैठे लोग जब ऐसी चूक करते हैं तो नुकसान कई गुणा ज्यादा होता है और वो इस बयान ने किया है। खुशी की बात यह है कि खेल संगठन और खेल प्रेमी इस तरह की टिप्पणियों को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं।
हमारे गृहमंत्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि अन्य क्षेत्रों में भले ही वह इस प्रकार की गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी करके बच निकलते हैं परंतु खेल जगत अभी इन्हें नजरअंदाज करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। पिछले दिनों जब पाकिस्तान की शूटिंग व अन्य टीमों को भारत सरकार द्वारा वीजा देने से मना किया गया, उसी समय अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक खेल संघ (आईओए) ने भारतीय खेल संघ के अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजन के अधिकार छीन लिए थे। जिसकी वजह से कुछ महत्वपूर्ण खेल आयोजनों के लिए भारतीय खेल संघ अपना दावा पेश नहीं कर पाया। वर्तमान में नई सरकार को आईओए को लिखित में देना पड़ा है कि वह अपने यहां खेलने आने वाले खिलाडिय़ों को वीजा देने में कोई पूर्वाग्रह नहीं बरतेगी। इसके बाद ही आईओए ने भारतीय प्रतिनिधियों का इसकी मीटिंग में भाग लेने का रास्ता प्रशस्त किया है।
इसी तरह पिछले दिनों किसी पत्रकार ने फिल्म स्टार अभिषेक बच्चन से पूछा कि आपका कबड्डी लीग के लिए पैशन का स्रोत क्या है? तो उन्होंने कहा कि कबड्डी हमारे देश की मिट्टी से जन्मा खेल है और खेल लोगों को जोड़ता है। अत: लोगों को उनकी मिट्टी से जोड़कर रखने वाला सशक्त खेल मेरी पसंद है। यहां खेल से एक स्वस्थ संबंध की खुशबू आती है। खास इसी रिश्ते के विस्तार की जरूरत है जो लोगों में डर की नहीं बल्कि आपसी मेलजोल की भावना पैदा करता है।
मानव सभ्यता उत्तरोत्तर विकास में अनेक तरह के स्रोतों से अनेक तरह की ऊर्जा लेते हुए संतुलन बनाकर आगे बढ़ती है। अगर हम प्यार, सद्भाव, मेलजोल बढ़ाने वाले खेल जैसे क्षेत्रों को भी हिंसा व युद्धों के क्षेत्र बना देंगे तो मानव सभ्यता का बड़ा नुकसान कर रहे होंगे। खट्टे-मीठे स्वादों से गुजर कर ही जीवन का जायका बनता है। उस जायके से अगर मिठास को ही गायब कर देंगे तो केवल खटास पर जीवन चल नहीं सकता। इसी प्रकार खेल में हार -जीत के अलावा जो आनंद है, खेल भावना उस आनंद के आस्वादन पर जोर देती है। खेलों से स्वस्थ रिश्ता केवल और केवल इसी जगह से बन सकता है। हार-जीत उसके गौण पहलू हैं। खेल भावना से खेल को खेलने में उसका सार छुपा है
अभी 21 जून को बड़े गर्व के साथ हम योग दिवस मना रहे थे। इस मौके पर माननीय गृहमंत्री हरियाणा के सबसे बड़े आयोजन का रोहतक में नेतृत्व कर रहे थे। जैसे ही उन्होंने इस आयोजन को खत्म करके अपनी पीठ फेरी, उसी पल वहां पर उपस्थित योगियों ने योग मैट की लूटपाट का काम शुरू कर दिया। उस भौंडे नजारे की तस्वीरें पूरे मीडिया में शाया हुईं। खासतौर पर वीआईपी वाली मैट पर ज्यादा छीनाझपटी हुई क्योंकि वो खादी से बनी ज्यादा कीमती थी। यह इस बात का द्योतक है कि आपने शारीरिक रूप से लोगों को कुछ क्रियाएं करवा दीं मगर मानसिक स्तर पर उन्हें परिपक्व नहीं किया। दोनों काम न किए जाएं तो चीजें कर्मकांडों में परिवर्तित हो जाती हैं। आप क्रिया विशेष को कर रहे होते हैं परंतु आपके तन व मन पर कोई असर नहीं हो रहा होता है। उस क्रिया में साधकों को जोडऩे के लिए आपको कुछ विशेष प्रयास करने होते हैं। उदाहरणतया 21 जून विश्व योग दिवस, विश्व मानववादी दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। मानववाद यूरोप के पुनर्जागरण (रेनेसा) से निकला एक मूल्य व विचारधारा है, जिसके अनुसार सभी गतिविधियों का केंद्र मानव कल्याण होना चाहिए।
ठीक है, हम सामाजिक, सांस्कृतिक व भौगोलिक कारणों से राष्ट्रों में बंटे हुए हैं परंतु अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजन भी तो उसी मानव सभ्यता को समृद्ध करने के लिए ईजाद किए गए हैं। तो उन्हें उनकी जगह तक ही सीमित रखना मानव मात्र के लिए कल्याणकारी है, न कि उसे भी नफऱत व हिंसा का मैदान बना लें। अत: आज जरूरत है खेल भावना को उत्तरोत्तर विकसित करने की व अन्य क्षेत्रों में इसके सार को ले जाने की। न कि युद्ध संग्राम की भावना को खेलों में फैलाने की।
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